राजा परीक्षित द्वारा कथा सुनना

 

राजा परीक्षित द्वारा कथा सुनना

एक राजा परीक्षित थे। उनके पुरोहित ने उन्हें बताया कि अगर कोई भगवद् गीता का पाठ पूरा सुन ले तो उसकी मुक्ति हो जाएगी। तो राजा ने पुरोहित को कहा कि तुम मुझे पूरा पाठ सुनाओ। जब पुरोहित ने पूरा पाठ सुनाया और उन्होंने सुन लिया तो उन्होंने कहा, अब मेरी मुक्ति कराओ। पुरोहित बड़ी मुश्किल में फँस गया कि मैं राजा कि मुक्ति कैसे कराऊँ? उसके हाथ-पैर ठंडे होने शुरू हो गए। क्योंकि वह जमाना ऐसा था कि अगर राजा ने कुछ कहा और वह नहीं हुआ, तो फटाफट सिर कट जाता था। तो पुरोहित के पसीने छूटने शुरू हो गए। उसने कहा, 'महाराज आप मुझे आठ दिन का समय और दीजिए। उसके बाद मै आपकी मुक्ति करा दूँगा।" उसने सोचा कि मैं विचार कर लूँगा कि मुझे क्या करना है।

जब वह अपने घर गया, तो बड़ा उदास था क्योंकि उसे समझ में नहीं आ रहा था कि राजा की मुक्ति कैसे कराई जाए। उसकी एक जवान बेटी थी। उसने देखा कि मेरा पिता उदास है। उसने पूछा क्या बात है. तो पुरोहित ने कुछ बताया नहीं। लेकिन बेटी ने जब देखा कि उसके पिता दिन पर दिन और उदास होते जा रहे हैं, तो उसने ज़ोर देकर पूछा कि क्या बात है? तो पुरोहित ने सारी बात बेटी को बताई कि मैंने राजा को भगवद् गीता का पाठ सुनाया, अब राजा कहते हैं कि मैं उनकी मुक्ति कराऊँ। लेकिन मुझे पता नहीं कि मैं उनकी मुक्ति कैसे कराऊँ। तो बेटी ने कहा, "ठीक है, मैं राजा के पास आपके साथ जाऊँगी और उनसे बातचीत करूँगी।" आठ दिन तक पुरोहित को कोई हल नहीं मिला, तो लाचार होकर आठवें दिन उसने अपनी बेटी को कहा कि तुम मेरे साथ चलो। जब महल में राजा के सामने पुरोहित और उसकी बेटी पहुँचे, तो राजा ने पुरोहित से कहा कि अब मेरी मुक्ति कराओ।

उसकी बेटी ने कहा कि इससे पहले मेरे पिता आपकी मुक्ति करायें, मैं आपसे कुछ बात करना चाहती हूँ। राजा ने कहा ठीक है। तो बेटी ने कहा, 'बातचीत मैं बाहर बाग में करना चाहती हूँ। आप और मेरे पिताजी, साथ चलें वहाँ।" राजा उसके साथ बाग में चला गया। वहाँ पर और कर्मचारी भी थे, बेटी ने कहा, "इनको भी यहाँ से दूर भेज दीजिए।" जब वे कर्मचारी वहाँ से चले गए, तो पुरोहित की बेटी ने पहले अपने बाप को एक पेड़ के साथ बाँध दिया। तो राजा ने कहा, "यह तुम क्या कर रही हो?" बेटी ने कहा, "मैं जो भी कर रही हूँ, मुझे करने दीजिए, ताकि आपकी मुक्ति ठीक प्रकार से हो सके।" तो राजा ने कहा, "ठीक है।" फिर बेटी ने राजा को भी एक पेड़ के पास बुलाया और उसे भी पेड़ के साथ बाँधना शुरू कर दिया। राजा ने थोड़ा शोर मचाया, तो लड़की ने कहा, 'आप बैठो, आपकी मुक्ति हो जाएगी।" जब राजा भी बँध गया और पुरोहित भी बँध गया, तो बेटी ने राजा से कहा, "अब आप जाकर मेरे बाप को मुक्त कर दो" तो राजा ने कहा, "तू मूर्ख लड़की है। मैं कैसे उसे मुक्त कर सकता हूँ? मैं तो खुद बँधा हुआ हूँ। तो उसने कहा, 'राजा, फिर ये पंडित आपको कैसे मुक्त कर सकता है? यह भी तो बँधा हुआ है।"

तो महापुरुष हमें यही समझाते हैं कि जो इंसान खुद बँधा हुआ है, जो कर्मों के विधान में है, वह हमें कैसे छुड़ा सकता है? एक ऐसा संत ही हमें छुड़ा सकता है, जो कर्मों के दायरे से बाहर हो, ऐसा महापुरुष जो सचखंड से आया हो। जिसे प्रभु ने इस धरती पर भेजा हो, ताकि वह रूहों को वापस परमात्मा के साथ जोड़ दे।

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